साधना करते चलना

आज सुबह रजाई हटाई तो पैरों की जगह सीधे धड़ उतरने को आतुर हुआ तो पाया पैर अपने स्थान पे नहीं।
ज्यादा ढूंढने की मशक्कत नहीं करनी पड़ी वो वही पड़े दिखे जहां कल टहल रहे थे और किसी गड्ढे में गिर पडे थे,वो पैर अभी तक उसी कीचड़ में खेल रहे थे।सहसा मुझे देख डरे बोले भूत बिना पैर का।मैंने समझाया भूत मैं नहीं तुम हो मैं तो वर्तमान में तुमको न पा के झाँकने आया ,मैं भी तुम ही हूँ पर बाँट ढिया गया हूँ।आओ ,चलो ,जानो, देखो, जियो पर उनके कीचड में गिरे पड़े रहने का मजा ही कुछ और था ।पर सबका समय अपने समय पे आता है ,कीचड में भी कोई कितनी देर रहेगा।धड़ रुका बीच में बिना पैर के कहाँ जाता आधा आधा बटा था ।अचानक हटी हुई रजाई से उतरने को आतुर पैर ने जमीन को चूमा और खींचा धड़ को आगे यात्रा को ,की भूत में नहीं अटकना चलो,आगे चलो, की बात कुछ ये है कि जो हुआ हुआ, भूत में अटके अटके यात्रा नहीं होगी, वहां सिर्फ पुरानी बासी दुर्गन्ध है उसे सुगंध मान कब तक आगे न जाऊं।

साधकों,साधना करते चलना होगा ,गिरना भी होगा उठना भी होगा पर मेहेरबानी करना अपने पे, चलते चलना ,चलते चलना ,की बात इस बार समाप्त हो ही जाए।

ध्यान मार्गदर्शक व दैवज्ञ श्री मणि भाई जी
9919935555

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