ध्यान की अग्नि
जब साधक #ध्यान् करना प्रारंभ करता है तो सर्वप्रथम मन के विस्तार जो सर्वत्र व्याप्त है, को खींच के एक केंद्र पर लाने का प्रयास कर रहा होता है।ठीक उसी समय उसके मन से संबंधित अनंत बहाने उसके सामने आना शुरू कर देते हैं जिसे क्योंकि उसे अभ्यस्तता नही मन के अविस्तार की ,वो घबरा जाता है यह सोच के की #गुरु ने बताया यह #ध्यान है यह करो और कर भी रहा हूँ किन्तु #ध्यान तो लग ही नही रहा #ध्यान तो किसी पे किये पुराने क्रोध में मुझे जला डाल रहा है ,#ध्यान तो मुझे निवस्त्र लड़कियों के अंगों पे ले जा रहा है कितना पैसा कहा फसा हुआ वह दिखा रहा है ,यह #ध्यान नही हो रहा मन भटक रहा है और कई तरह के भटकावों से पीड़ित हो गुरु पास पूछने जाता कि #ध्यान नही लग रहा क्या करूँ ,अब गुरु यदि #ध्यान की अग्नि में तप के , जल के कुंदन हुआ है ,तो पथिक के कंटको के बारे में सूक्ष्म रूप से समझायेगा ,साथ ही यह भी समझेगा की बताने से कुछ नही होगा ,उस क्षेत्र में जिसमे वो पूछ रहा है क्योंकि मार्ग स्वानुभव से प्राप्त लाल अंगारों को पीने जैसा है और यदि किताबी #ध्यान में पारंगत तथाकथित गुरु होगा तो साधक यदि वास्तविक सत्य का पथिक है तो अंततः पुस्तकीय #ध्यान मात्र वमनीय ज्ञान को त्याग ही देगा ।और ध्यान देना ऐसा गुरु जाने भी नही देगा अपने से दूर?उसे भीड़ चाहिए और अच्छे साधक की भीड़ का अहंकार भी।
#ध्यान में जब बैठा जाता है तो ध्यान नही हो रहा होता ,मन को केंद्रित करने का प्रयास मात्र किया जा रहा होता है ,उस के इस महाविलाप को एक क्षण शांति का आभास कराने का क्षणिक प्रयास किया जा रहा होता है ,जिस कृत्य में समस्त जगत में विस्तारित मन सहसा सघन से आते आते सूक्ष्म केंद्र पे होते होते अचानक एक शुभ क्षण प्राणलीन हो उस एक के झरोखे से उस को चख लेता है और अनंत असीम सुगंध से समस्त ब्रह्म पुलकित हो उठता है।परंतु मेरे सभी सच्चे साधक ये सुनना, कभी भी यह घटना कोई निश्चित कर्म करने से नही घटेगी ,हर घटना के हरेक के साथ घटने का एक अलग पुराण होगा,एक अलग काव्य होगा, एक अलग सुर होगा, जिसमें समस्त जगत विरोधी होगा और आपके ध्यान को घटाने की समस्त क्रियाओं का पूर्णरूपेण दमन होगा हर कोण से,अर्थात आर्थिक कमी,सामाजिक बहिष्कार,इस देह का बहिष्कार,धन से संबंधित पकड़ और छूट का खेल,अपने काम केंद्र के अनसुलझे नृत्य ,एक अद्वितीय पागलपन की पराकाष्ठा को तैयार आत्मा परमात्मा के गुप्त द्वार से प्रवेश ले लेती है।किंतु कितनी भी कठिनाई हो ,जीवन दूभर हो जाये ,सहृदय स्वीकारना ,खुले दिल से पी जाना ,हसते हुए जल जाना ,एक काम करना बस देखते रहना और ध्यान की दरी बुनते चलना,बुनते चलना।
ये देखो उत्तराखंड के जंगल ,ये जंगल ये तुम हो इसमें लगी अग्नि तुम्हारा #ध्यान है जितना हवा का झोंका आएगा और तूफान आएगा ये अग्नि और भड़का देगा ,ऐसे ही आपकी ध्यान की अग्नि हो जितने बवंडर आएं इसको और भड़का दें और धधक के अपने पूर्ण जंगल रूपी “मैं” को समाप्त कर देना ।
आप छोटे से दीये की बाती थोड़े ही हो जो कोई पास से गुजर भी गया और आपको हिला गया ।
आपमे अनंत शांति का ऐसा बल है जो आपके सहज बैठे रहने भर से सभा मे शान्ती और अशांति का ऐसा मिश्रित इत्र फैला दे जो उनके भीतर व्याप्त #ध्यान को घटने पे मजबूर करा दे।

सब करना पर किताबी #ध्यान न करना ।
इस अग्नि को न बुझने देना।

महाकाल ध्यान संस्थान
श्री तारामणि भाई जी
(ज्योतिर्विद ,ध्यान मार्गदर्शक,मृतात्मा सम्पर्ककर्ता)
9919935555

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