गुरु शिष्य संबंध

 

गर्मियों की झुलसा देने वाली धूप से भीगा हुआ शरीर ले एक दोपहर किसी प्रिय को #साधना मार्ग में आगे जाने हेतु “भगवान काल भैरव” कृपा से कुछ ज्ञानामृत बौछार कर वापस अपने स्थान पर छत से वायु फेंकते तीन संयुक्त पंखों की कृपा प्राप्ति से शरीर को शीतलता आभासित होते ही शांत चित्त  जब विश्राम किया तो सामने से इशारा हुआ और गहराई में जाते हुए एक दृश्य प्रकट हुआ जिसमें एक गुरु जी अपने सुपुत्र के साथ मिल के मेरी पीठ पे बड़ी बेरहमी व निर्दयता लिए हुए कुछ ऐसा प्रयोग कर रहे थे जिसे देख मुझे उनके गुरु पद पे बैठे होने पर अचरज हुआ ।क्योंकि भाव हमेशा बाल रूप रहता है निश्छल भाव लिए जब तक छेड़ा न जाये कोई भी सर पे पैर रख के चला जाये प्रेम में सब स्वीकृत है उसी भाव में करुणा व अचरझ भरे शून्यमय गीले नेत्रों से ताकते हुए भीतरी तूफान ने प्रश्न करा की “यह क्यों” क्या कलयुगी गुरु पद यही है? पूछते से ही उनका क्रिया कर्म और कठोर व निर्दयी क्रूर रूप लेने लगा तो उनसे उत्तर न पाने की स्थिति में प्रश्न को उस शक्ति से पूछा जिस ने यह दृश्य दिखाया और ज्ञात हुआ कि इन गुरु जी को मेरे साधको की जिज्ञासा हेतु डाले हुए मंत्र ज्ञान की वीडियो से क्रोध आया और इसी क्रोधाग्नि में स्वयं को जलाते हुए अपने ही बोए बीज को समाप्त करने चले।एक प्रश्न कौंध के आया कि यदि आपत्ति थी उनको बताना चहिये था कि यह न करें बजाए इसके सीधे कायरो की तरह पीठ पीछे प्रयोग तो मेरा #कालभैरव अनैतिक तो सहन ही नही करेगा किसी भी क़ीमत पे ।जहां वह स्वयं हजारों मंत्र का ज्ञान दे रहे दुनिया भर में किताबे मंत्र से भरी पड़ी हैं, उसमें मेरे विस्तार से सीर्फ अहंकार को चोट लगने के अलावा तो और कोई कारण नही सामने आया और इधर हुंकार आई कि यदि मैं गलत हु तो सहर्ष स्वीकार है और नही तो कर्म फल सभी को मिलेगा और प्रणाम कर उनके चरणों मे ,उठ के दैनिक ज्योतिष परामर्श कर्म में लिप्त हुआ।

दो दिन पश्चात ठीक उसी जगह बहुत तीव्र असहनीय दर्द होना शुरू हुआ और मुझे दो दिन पहले के दृश्य का प्रमाण मिलना शुरू हुआ ।कुछ साधक मित्रो से जांच करवाया की यह दर्द क्यों हुआ तो पता चला वही जो मुझे दिखाया गया वही प्रगोग उनको भी दिखा और उन्होंने भी आश्चर्य प्रकट करा की ऐसे गुरु तो गुरु पद पे बैठने लायक नही है उनको एक बार बोलना चाहिए था।जैसे जैसे मेरे शरीर का दर्द बढ़ रहा था वैसे वैसे मेरी सीमा समाप्त होती जा रही थी अचानक से चारो तरफ एक तीव्र प्रकाश ने आंख से आंख मिलाई जैसे और हुँकार हुँकार और घुर्राहट घुर्राहट असंख्य सर्प असंख्य चिता जलने जैसा मदिरा सुगंध लिए रक्तमय भव्य जबड़े से निकलती कटर कटर की हड्डियों को मसलने वाली ध्वनि से सारा वातावरण भयाक्रांत हो जैसे वास्तविक में मैं प्रकट हुआ और लगा एक छलांग में अपने मृगचर्मासन पे विराज हो लगा मदिरा का प्याला खींच चिलम का धुआं रक्तमय नेत्र ने जब डाली दृष्टि इस कर्म पे हुआ हुँकार गुंजायमान की यदि असत्य हूँ हे मेरे “काल भैरव” दे दंड सौगुना कर और लिटा चिता पे अभी मुझे और कर राख इस शरीर को और नही यदि मैं असत्य तो दिखा तमाशा इस कलयुग में एक सच्चे साधक के साथ हुए अपराध का इसी दहाड़ में सब माहौल को शांत कर मैं उठा निर्भार स्वस्थ्य शरीर प्रमाण था मेरी सत्यता का ।

“सत्य पर चले ,सत्य करे सत्य हो जाएं साधक का एक मात्र मार्ग सत्य” 

चामुंडा ज्योतिष केंद्र

ज्योतिर्विद व ध्यान मार्गदर्शक श्री तारामणि भाई जी

9919935555

www.chamundajyotish.com

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