क्या हम पागल से भी हो जाते हैं?

(एक साधक भाई का प्रश्न)
प्रश्न: क्या हम पागल से भी हो जाते हैं?
क्या अकेलापन अच्छा लगता है?

उत्तर(श्री मणि भाई जी): जी पागलपन ही नहीं बाहरी जगत के लिए यह शान्ति शुरुआत में पागलपन से भी बढ़कर है।एक तो यह बात की हम स्वयं में इतने अशांत हैं भीतर से की अचानक से हुए इस बदलाव को स्वयं के स्तर पर भी स्वीकार नहीं कर पाते ,इसे स्वीकारने में भी समय लगता है ,जब स्वयं इतनी अग्राह्यता है और नहीं संभल रही इतनी शान्ति तो बाहर तो स्वाभाविक रूप से इसे उनके विपरीत दिशा से देखा जायेगा जो उनके लिए पागलपन ही होगा ,जो पूर्णरूपेण स्वाभाविक है इस से कोई ज्यादा अर्थ भी नहीं है।
अकेलेपन की स्थिति इस लिए बन जाती है एक तो मनोवैज्ञानिक रुप से व्यक्ति में बदलाव हो जाते हैं जो बहुत गहरे से उसके संस्कारों की जड़ो को हिला चुकने के बाद प्रकाशित होते हैं जिस वजह से वो स्वयं में बातों में विचारों में शरीर में अपनी दृष्टि ऊर्जा सब में परिवर्तन आभास कर रहा होता है जिसे वो आपने में रह कर जीना चाहता है जहां वो बाह्य हस्तक्षेप नहीं चाहता कुछ समय ।दूसरा यह है कि जब वो उस की सुगंध से हल्का भी महक जाता है तो उसे वो महक में ही आनंद आता जो मौन में खिलती इसकी वजह से वो एक जगत में अकेलापन महसूस करता पर कही दूसरी जगह प्रवेश की योग्यता को उपलब्ध हो रहा होता।जिसकी वजह से शाब्दिक रूप में यदि अभिव्यक्त करा जाये तो आपका कहना सही है शुरुआत के लिए ।

महाकाल ध्यान संस्थान
श्री तारामणि भाई जी
9919935555
www.chamundajyotish.com

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