ईमानदार होना प्रथम आवश्यकता

स्व के लिए ईमानदार होना प्रथम आवश्यकता है ध्यानी साधक की।ईमानदारी से स्वीकार करना अत्यंत आवश्यक है।यदि 2 घंटे बैठ गए ध्यान के लिए और ध्यान घटित नही हो पाया तो पूर्ण ईमानदारी से स्वयं से कहिये नही हुआ।मन भ्रम में रखने का पूर्ण प्रयन्त करता है किंतु जब आप पूर्ण सत्यता व ईमानदारी से कृत्य की सफलता अथवा असफलता स्वीकार्यते हैं तो परिणामस्वरूप भविष्य की साधनाओं में होने वाले मानसिक भ्रामक खेल से बच जाते हैं।मन अपनी सुविधानुसार सत्य स्वीकार्यंने के लिए स्वतः लिपिबद्ध है जो लोग साधना सीखने सिखाने की माया में लिप्त हैं वो महान गुरुओं के स्वयं के मन के खेल को समझना अत्यन्त आवश्यक है।मन के पार अमन में प्रवेश अत्यंत दुर्लभ ,कठिन और साहसिक कदम है सर्वस्व त्याग आवश्यक है जो सामान्य व्यक्ति के क्षेत्र से बाहर की बात है।बौद्धिक रूप से सामान्य बात लगती है किन्तु है इसके विपरीत आयाम की बात।

श्री तारामणि भाई जी
महाकाल ध्यान संस्थान
9919935555
www.chamundajyotish.com

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